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Baraut, 12 May 2011

मुनिश्री मैत्री प्रभ सागर जी महाराज को उनके समर्थकों के साथ कल रात 2 बजे गिरफ्तार लिया गया.महाराज श्री का दोष सिर्फ इतना था कि उन्होंने निरीह पशुओं के कत्ल के खिलाफ आवाज़ उठाई थी लेकिन मायावती सरकार और प्रशासन ने महाराज की गरिमा का ख्याल न रखते हुए उन्हें एक अपराधी की तरह गिरफ्तार किया.

यांत्रिक पशु वधशालाओं को लाइसेंस देने के खिलाफ चल रहे जैन मुनि श्री मैत्रीप्रभ सागर महाराज के आमरण अनशन के १७ वें दिन उनको सरकार ने जबरदस्ती बंदी बनाकर किसी अज्ञात स्थान पर भेज दिया है. सभी जानते है कि जैन मुनि कभी भी वाहन आदि का प्रयोग नहीं करते और रात में एक स्थान से दूसरे स्थान पर गमन नहीं करते हैं तथा हमेश पैदल ही चलते हैं पर फिर भी पुलिस जबरदस्ती उनको आधी रात को जीप में उठाकर ले गयी है, ऐसी कार्यवाही शर्मनाक और जैन मुनिचर्या का घोर अपमान है.  

गौरतलब है कि मुनिश्री को समर्थन देने के लिए मंगलवार को मेरठ पूरी तरह बंद रहा था और रैली में २५ हज़ार से अधिक समर्थकों ने भाग लिया था, मुनिश्री के इस अहिंसक आन्दोलन को देश-विदेश से अपार जन समर्थन मिल रहा था,  जिससे उ.प्र. सरकार काफी घबरायी हुई थी इसलिए इस अहिंसक और शांति पूर्ण अन्दोलन को तुडवाने के लिए ही सरकार ने एक भयानक चाल  चली और भारी पुलिस बल का प्रयोग करते हुए रात के २ बजे मुनिश्री को गिरफ्तार कर लिया, समर्थकों के विरोध करने पर उन्हें बेरहमी से पीटा गया तथा १०० से ज्यादा समर्थकों को घसीट कर पुलिस वाहनों में ठूँस दिया गया.

देश के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जब किसी जैन मुनि को गिरफतार कर लिया गया है , १२ मई के इस दिन को भारत के इतिहास में काले अक्षरों में लिखा जाएगा क्योंकि जैन मुनियों आचरण और उनकी गरिमा के बारे में हर भारत वासी जानता है, उ.प्र. की सरकार द्वारा उठाया गया कदम पूरी तरह से अलोकतांत्रिक है और मौलिक नागरिक अधिकारों का खुला उल्लंघन है.

मुनिश्री की गिरफ़्तारी की खबर जंगल में आग की तरह सारे देश में फ़ैल चुकी है और समस्त अहिंसक समाज एवं पशु एवं पर्यावरणप्रेमियों ने उ.प्र सरकार के इस शर्मनाक कदम की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए आन्दोलन को और तेज़ करने की बात कही है.

राजस्थान के कोटा, जयपुर मध्य प्रदेश के सागर, बन्डा, विदिशा, इंदौर एवं महाराष्ट्र के मुंबई, वासिम से समाचार मिल रहे हैं कि लोग इस बर्बर कार्यवाही के खिलाफ सडकों पर प्रदर्शन की तैयारी में हैं.
By : Sandesh Doshi
Date: 2011-05-14 | More Tips>>
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Digambara Monastic Tradition
Article By: Sandesh Doshi - On Dated: 2007-10-17

The prominent Acharyas of the Digambar tradition were:

  • Acharya Kundakunda: author of Samayasar, etc.
  • Acharya Virasena: author of Dhavala
  • Acharya Aryanandi (monk).

In around 10th century Digambar tradition was divided into two main orders.

  • Mula Sangh: includes Sena gana, Deshiya gana, Balatkara gana etc.
  • Kashtha Sangh: includes Mathur gana, Lat-vagad gana, etc.

Acharya Shantisagar, the first Acharya of the 20th century, belonged to the tradition of Sena gana. Practically all the Digambara monks today, belong to the tradition of Acharya Shantisagar directly or indirectly.

The Bhattarakas of Shravanabelagola and Mudbidri belong to Deshiya gana and Bhatttara of Humbaj belongs to Balatkara gana.

Among the prominent Digambara Acharyas today are Acharya Sanmatisagar, Acharya Suvidhisagar, Acharya Vidyasagar, Acharya Vidyanand and Acharya Pushpadant.

 
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